- फल्गु नदी में स्नान के बाद श्रद्धालु दूध से तर्पण करते हैं।
- गायत्री, सावित्री और सरस्वती तीर्थों पर विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं।
- शाम को पितृ दिवाली के रूप में पितरों की स्मृति में दीप जलाए जाते हैं।
- पितरों की तृप्ति के लिए ब्राह्मणों को खीर खिलाने की परंपरा है।
- पुराणों में आश्विन कृष्ण त्रयोदशी का विशेष रूप से उल्लेख है।
महत्वपूर्ण निर्देश: पितरों की तृप्ति के लिए सही विधि-विधान से कर्मकांड करना आवश्यक है।
गयापाल पंडा बबलू मउआर के अनुसार, त्रयोदशी के इस दिन पिंडदानियों द्वारा विधिपूर्वक किए गए अनुष्ठान पितरों को मोक्ष प्रदान करते हैं। इस दिन फल्गु नदी में स्नान और तर्पण का विशेष महत्व है। इसके बाद श्रद्धालु गायत्री, सावित्री और सरस्वती तीर्थों पर स्नान करते हैं, जिससे पितरों की तृप्ति होती है।
त्रयोदशी की शाम को गयाजी में पितृ दिवाली मनाई जाती है। पिंडदानियों द्वारा जलाए गए दीप पितरों को प्रसन्न करते हैं और अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। पितृपक्ष के इस विशेष दिन पर ब्राह्मणों को खीर खिलाने की परंपरा भी है, जिससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।
इस प्रकार गयाजी में पितृपक्ष का 14वां दिन स्नान, तर्पण और दीपदान की परंपराओं के साथ पितरों को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करता है, जो वंशजों को उनके आशीर्वाद से सदा सुखी और समृद्ध रखता है।
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